Wednesday, May 12, 2010

पशुपालन


इन दिनों क्या आपने ध्यान दिया कि दूध के लिए पशुपालन से लोग कतराते हैं। कुछ हद तक सही भी है ,क्योंकि पशुपालन करना बहुत मुश्किल हो गया है उनके लिए चारे की समस्या सबसे मोटी है क्या करना है पशु रख कर दूध मोल ले लेंगे रोजाना की दूध की बन्धीवाला आधा किलो दूध अतिरिक्त नहीं दे सकता फिर विवाह शादी में जितना मर्जी दूध,मावा,छन्ना कहाँ से आजाता है आये दिन सिंथेटिक दूध के समाचार जानने को मिलते रहते हैं। क्या इस तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए?बेचारी गाय दर दर की मोहताज़ हो गयी।आओ कुछ सकारात्मक कदम उठायें.

Monday, May 10, 2010

चिट्ठी बापू को

बापू माफ़ करना,मैंने तुम्हे बहुत देर से समझा है। मै कभी तुमसे सहमत नहीं रहा और सदा विरोध करता था। अब समझ में आ रहा है कि तब मेरी समझ का स्तर कितना नीचा था। अभी भी तुम्हें समझने में बहुत समय लगेगा पर संतोष है कि सही दिशा तो मिली। विश्वनाथ भाटी ,तारानगर[चुरू]

Sunday, May 9, 2010

vichar

1.Good heart & good nature are two different things.Good heart can win many relationships but good nature can sustain lifelong relationship.

2.Good things come to those who wait.

Better things come to those who Try.

Best things come to those who Believe in their efforts.

3.Life is like a mirror.What we put into it ,comes back to us.-perhaps more never less.

4.Always care extra care of three thingsin life:

#Trust #promise #Relation

Because they don't make noise when break.

5.Small minds talk about results.

Average mind talk about business.

Great minds talk about growth but Champions never talk;They just perform and the World talk.

Saturday, May 8, 2010

वह मेरा भगवान नहीं है।

जिस पत्थर को पूजा करता वह मेरा भगवान नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं है॥
भाई भी बहनों को भूला ,बहनें भूली भाई को,
स्वार्थ की चक्की में पिसकरबच्चे भूले माई को,
पैसों की पर्तों में लिपटे रिश्तों की पहचान नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं है॥
सच्चाई का गला घोंटकर बढ़ा झूठ का मान यहाँ,
इंसानों का मोल घटा है,बिकता रोज ईमान यहाँ,
सच्ची बातें सुन ने वाले बचे यहाँ पर कान नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं है॥
khadi ro रही आज द्रौपदी,पर किसना की खबर नहीं है,
पांडव बनकर सब कुछ देदो,दुर्योधन को सब्र नहीं है,
भीष्म बने अन्याय गटक लो,गांडीव सूना,बाण नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं है॥
जाति,मज़हब ,उंच-नीच ने ,कतरा-कतरा इन्सान बांटा ,
सर गिन लो ,गिनते जाओगे ,पर सब पर छाया सन्नाटा,
लाशें ही लाशें दिखती हैं,मगर किसी में जान नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं है॥
बची हुई है इक चिंगारी ,दिल के कोई कोने में,
पा कर पवन पुनः सुलगेगी ,जोश भरेगी बौंने में,
दिल की बातें जिन्दा दिल से ,मुर्दों पर अरमान नहीं नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं हैं॥
विश्वनाथ भाटी,तारानगर,चुरू,राजस्थान। ३३१३०४ ०९४१३८८८२०९ ,01561-240973

तीर्थयात्रा

लघुकथा तीर्थयात्रा *विश्वनाथ भाटी " इस बार इच्छा है कि चारधाम कि यात्रा कर आऊं.सांसों का क्या भरोसा ,कब निकल जाये. "पार्वतीदेवी ने विजयबाबू के समक्ष अपनी बात रखी ."ठीक ही है अगर बेटा करवा रहा है तो कर ही आओ. "विजयबाबू ने अखबार का पन्ना पलटते हुए कहा. "ऐसा क्यों कहते हो,वो आपका बेटा नहीं है क्या ?""बेटा तो क्यों नहीं है मगर मैं उसे तुमसे ज्यादा जानता हूँ. इस बार भी कोई बहाना निकाल लेगा.""आपको भी है ना शक करने की आदत सी पड़ गयी है .पिछली बार तो ऐनमौके पर कंपनी का कामआ गया था वरना उसका तो पक्का पक्का मानस था.""मैं कब रोकता हूँ ,जाओ ना; यदि ले जाता है तो बढ़िया बात ही है""पोस्टमन..."गली में आवाज सुनाई दी .वह दौड़ी दौड़ी सी दरवाजे तक गयी .सुनील का ही ख़त था. उसकी आँखे चमक उठी ."यह लो ,सुनील का ख़त है शायद तीर्थयात्रा का समाचार भेजा हो."पार्वतीदेवी की नज़रें विजयबाबू के चेहरे पर टिक गयी."समाचार तो तीर्थयात्रा का ही है ,मगर किसी और का."विजयबाबू ने चश्मा अख़बार पर रखते हुए कहा. "और किसी का ;क्या मतलब?""लिखा है किअपने सास -ससुर को लेकर चारधाम कि यात्रा पर जा रहा हूँ.इस बार नहीं आ सकता .विचार मत करना .अचानक ही प्रोग्राम बन गया ."पार्वतीदेवी पत्थर बनी खुले पड़े ख़त को देखती जा रही थी. रसोईघर से सब्जी जलने कि गंध आ रही थी. विश्वनाथ भाटी ,वार्ड न ८,पो.तारानगर[चुरू] राजस्थान ०९४१३८८८२०९

Friday, May 7, 2010

धर्म और विज्ञान

[पर्दा खुलता है। मंच पर दो पात्र नज़र आते हैं। एक धर्महै तो दूसरा विज्ञान । विज्ञान के हाथों में मिसाइल है। धर्म के हाथों में ध्वज है। ]
विज्ञान-हा हा हा ...मै कितना ताकतवर हूँ। आज पूरी दुनिया मेरे चरणों में नत-मस्तक है। चारों तरफ मेरा ही परचम लहरा रहा है।
धर्म -मगर मेरे भाई ,मेरे बिना तुम्हारा क्या मूल्य है?बिना धर्म के विज्ञान अँधा है।
विज्ञान-हा हा हा ही ही ही ...क्या बात करते हो धर्म ;आज तो बस मेरा ही राज है। तुम्हें आज पूछता कौन है?मेरी मानो और किताबों के पन्नों में दुबक कर बैठ जाओ।
धर्म-अरे भाई विज्ञान,इतना अहंकार भी कोई काम का नहीं। धर्मका महत्त्व कभी कम नहीं होता। मैने युगों -युगों से दुनिया को राह दिखाई है।
विज्ञान-राह दिखाई है या लोगों को भीरु बनाया है?राह दिखाने का काम तो मेरा है। मैंने पूरी दुनिया का स्वरुप ही बदल डाला है। आज जिधर देखो उधर विज्ञान ही विज्ञान नजर आता है। धर्म को पूछता कौन है मेरे भाई।
धर्म-मैंने लोगों को सोचना सिखाया,कल्याण का मार्ग दिखाया,दया,करुणा आदि मूल्य सिखाये।
विज्ञान-कल्याण!अरे भाई धर्म तुम्हें जरूर गलतफहमी हुई है। कल्याण तो सारा विज्ञान ने किया है। आज यातायात,चिकित्सा,संचार,खान-पान आदि सभी कुछ तो मेरी देन है।
धर्म-और परमाणु बम भी तो तुम्ही ने दिया है। तुम देते जरूर हो मगर तुम्हारे पास जो सबसे बड़ी कमी है वो है विवेक की कमी।तुम लोगों को भौतिक रूप से समृद्ध कर दोगे किन्तु मानवीय मूल्य तो धर्म ही दे सकता है।
विज्ञान-क्यों इतराते हो?आज मानवीय मूल्यों को पूछता कौन है?
धर्म-मत पूछो,मुझे क्या। नहीं पूछने का परिणाम तो तुम देख ही रहे होंगे। आज चारों ओर हिंसा,मारकाट,बलात्कार,लूट आदि इन्ही मूल्यों के घटने का परिणाम है।और धर्म ही इसकी दिशा बदल सकता है।
विज्ञान-शायद तुम्हारी बात ठीक हो पर आज आदमी के पास इन सब फालतू की बातों के लिए वक़्त नहीं है।
धर्म-भाई विज्ञान,जरा ठण्डे दिमाग से सोचो। तुमने परमाणु के बम तो बना दिए,पर यदि किसी दिन इनका उपयोग हो गया तो .....तो क्या होगा?सोचा है कभी?फिर जब सारी दुनिया ही मिट गयी तो कौन राजा और कौन प्रजा?
विज्ञान-फिर तुम्ही बताओ मुझे क्या करना चाहिए?
धर्म-तुम निराश मत हो ओ । मेरे साथ हाथ मिलाओ। हम दोनों मिलकर मानवता को बचा सकते हैं। [विज्ञान आगे बढ़ता है,धर्म के साथ हाथ मिलाता है। ]
धर्म और विज्ञान-[एक साथ]हम दोनों साथ मिलकर मानवता की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। आओ मनुष्यों हमारे साथ मिलकर इस पुनीत संकल्प को सफल बनाओ।
[धीरे -धीरे पर्दा गिरता है.]
विचारक शिव खेडा ने कहा है कि "जीतने वाले कोई अलग काम नहीं करते बल्कि वे हार काम को अलग ढंग से करते हैं"जीतना सभी चाहते हैं ,मगर जीत का मूल्य चुकाने के लिए कितने तैयार रहते हैं?वर्तमान सन्दर्भ में सामाजिक दृष्टिकोण में बहुत बदलाव आया हैघर की नारी दहलीज़ लांघकर अर्थ की दौड़ में जुड़ गयी हैकलदार की खनक ने उसे भ्रम के भंवर में धकेल दीया हैमिटटी का दीया धरती से ही नफरत करने लगा हैजीत की हौड ने नारी और दहलीज़ के बीच परायेपन की दीवार खींच दी है

दिल की गहराइयों में डूब जाने की जरूरत है,

कितना मज़बूत है ईमान,आजमाने की जरूरत है,

दुनिया को बदलने की चाह रखनेवालों,सुनो,

गिरेबान में तो देखो,बदल जाने की जरूरत है

रिश्तों की जान संवेदना में होती है,लेकिन आज रिश्ते भी बोझ बन गए हैंदुनियाभर का वज़न लादे हम लोग रिश्तों का बोझ उठाने में थक से जाते हैं और जीवन बोझिल हो जाता हैआज दहलीज़ परायी बनती जा रही हैसंवेदना शून्य समाज में अर्थ ही सब कुछ बनता जा रहा हैमगर यह तो देखें कि दिलों की अनदेखी करके अगर जग भी जीता तो क्या जीताजीत की चाह रखना बुरा नहीं पर जीत के लिए आधार को ही भूल जाना चिंता का विषय जरूर है दहलीज़ का प्यार ही संसार की विशालता के दर्शन करवा सकता हैसौदा महंगा भी नहीं। दहलीज़ के बड़े -बूढ़े हाथ पैसों की नहीं झुके; हुए सिरों की चाह रखते हैंजिसने दिल जीतने का हूनर सीख लिया,वह संसार का सबसे बड़ा विजेता हैदिल जीतनेवाले तलवार वालों पर राज करते हैं

इन दिनों दहलीज़ की अनदेखी ने विशेषकर नारी को एक ऐसे गर्त में धकेल दिया है,जहाँ आत्मिक आनंद को कभी नहीं पाया जा सकताजीत के सफ़र की शुरुआत दहलीज़ से ही करेंकहा भी गया है कि दुनिया का सबसे बड़ा नुकसान वो है कि किसी आँखों में आंसू हमारी वजह से दुनिया की सबसे बड़ी उपलब्द्धि यही है कि किसी की आँखों में आंसू हमारे लिए मन के छलावे में आकर आत्मा के आनंद को भुला देना समझदारी नहीं कही जा sakti

विचारक शिव खेडा ने कहा है कि "जीतनेवाले कोई अलग काम नहीं करतें बल्कि वे हर काम को अलग ढंग से करते हैं"जीतना सभी चाहते हैं,मगर जीत का मूल्य चुकाने के लिए कितने तैयार रहते हैं?वर्तमान सन्दर्भ में व्यक्ति के सामाजिक दृष्टिकोण में बहुत बदलाव आया हैघर कि नारी अर्थ कि दौड़ में जुड़ गयी हैकलदार कि खनक ने उसे भ्रम के भंवर में धकेल दिया हैमिटटी का दीया धरती से ही नफरत करने लगाजीत कि हौड ने नारी को दहलीज़ से पराया बना डाला


दिल की गहराईओं में डूब जाने की जरूरत है,


कितना मज़बूत है ईमान ,आजमाने की जरूरत है,


दुनिया को बदलने की चाह रखने वालो ,सुन लो,


गिरेबान में तो देखो,बदल जाने की जरूरत है


रिश्तों की पहचान संवेदना में होती है,लेकिन आज रिश्ते भी बोझ बन गए हैंदुनियाभर का वज़न लादे हम लोग रिश्तों का बोझ उठाने में थक से जाते हैं और जीवन बोझिल हो जाता हैंदहलीज़ की परवाह छोड़ देने से अर्थ तो मज़बूत बन गया परन्तु रिश्ते दम तोड़ने लगेयह हमारी जीत नहीं,करारी हर हैहम जीत का सफ़र दहलीज़ से ही शुरू करेंआशीष देने को तरसते हाथों को पैसो की नहीं,झुके हुए सिरों की जरूरत हैटूटे हुए दिलों में प्यार नहीं ठहरतादहलीज़ की बगिया प्यार के फूलों से ही सुसज्जित होगी


ख्वाहिशों की दौड़ में हम भावनाओं की मिठास ही खो बैठे


ख्वाहिश ऐसी करो कि आसमां तक जा सको,


दुआ ऐसी करो कि खुदा को पा सको,


यूँ तो जीने के लिए पल बहुत कम है,


पर जीयो ऐसे कि हर पल में जिन्दगी को पा सको


दिल जीतनेवाले तलवार वालो पर राज करते हैंरिश्तों कि मिठास को पहचान कर ही दहलीज़ का मान रखा जा सकता हैंघर के बड़े -छोटो को दी गयी इज्ज़त कई गुना बढ़कर वापस मिलती हैअर्थ की दौड़ में अनर्थ ना हो यही मनुष्यता की आवश्यकता हैजो दहलीज़ जीत गया ,संसार उसका हैदुनिया का सबसे बड़ा नुकसान वो है जो हमारी वजह से किसी की आँख में आंसू हैसबसे बड़ी उपलब्द्धि वो है जो किसी की आँख में आंसू हमारे लिए

Thursday, May 6, 2010

Saturday, May 1, 2010

नमन

देश की मिटटी में जन्मे और इसी में मिल गए,
कीर्ति सौरभ लुटातेफिर सुमन से खिल गए,
आज कैसा लहलहाता ,चमचमाता यह चमन ,
अमर शहीदों को नमन
उन वीर सिंहों को नमन।
आस्था हर श्वांश में थी ,लक्ष्य ले बढ़ते कदम
बेड़िया लाख मात तेरी ,प्राण -अंतर में घुटा दम
ऐसी सुसंतान पा कर मुस्कराया यह वतन
अमर शहीदों को नमन
उन वीर सिंहों को नमन।
प्राण का दीपक जलाया ,आरती कण -कण सजी
माते तुम्हारी वंदना में ,श्वांश की झांझर बजी
बल दो की अर्पण कर सकूँ ,चरणों में तेरे सर सुमन
अमर शहीदों को नमन
उन वीर सिंहों को नमन ।
विश्वनाथ भाटी,तारानगर ,चुरू

Friday, April 30, 2010

लघु कविता

विश्व प्रसारण का प्रेमी
प्रेमिका से बोला तुम हो
तितली सी
लगती हो मुझे
बीबीसी.

काम और समय

आदमी को काम कीअधिकता नहीं मारती बल्कि काम की अनियमितता मार डालती है। काम को सही समय पर पूरा करने के लिए समय का नियोजन आना बहुत जरुरी है। चार तरह के काम हमे करने होते हैं। १.वो काम जो हमे ही करने पड़ेंगे ,जैसे -नहाना,सोना,शौच जाना आदि। २.वो काम जो जरुरी हैं जैसे-ड्यूटी पर जाना,बच्चों को स्कूल छोड़नाबीमार होने पर दवाई लेना आदि। ३.तीसरे तरह के काम आदत से जुड़े होते हैं,जैसे टीवी देखना,देर तक सोना । ४.रूचि के काम सिनेमा जाना,क्रिकेट खेलना आदि। जब हम कोई विशेष लक्ष्य के लिए आगे बढ़ रहे हैं तो एक बार हमें क्रमांक ३ व ४ को स्थगित करना होगा। अपने सबसे अच्छे समय में हम जरुरी और महत्वपूर्ण काम काम पूरे करें। समय का मूल्य समझेंगे तो समय हमारा मूल्य बनाये रखेगा।
विश्वनाथ भाटी ,तारानगर ९४१३८८८२०९

Friday, April 16, 2010

कविता


तेरे लिए कहते,सुनते
खरी या खोटी ,
वाह री रोटी।


मम्मी की झिडकी
बेचारी लड़की

लंका
सोने की थी
तभी तो
कुम्भकरण जैसे लोग
सोये रहते थे

क्या कहूँ मैं
इस कमी को
पी रही है शराब
आदमी को


Saturday, April 10, 2010

विरोध का स्वर

भारत में पहले हर बात का विरोध होता है,फिर उसी का समर्थन भी होता हैजब राजीव गाँधी कहते थे "हम देश को २१ वीं सदी में ले जायेंगे, देश में कंप्यूटर क्रांति आएगी,देश तेज गति से आगे बढेगा आदि ..."तो उनकी बातो का विरोध होता थाक्या आज है?
मंडल आयोग आयावी.पी.सिंह का विरोध हुआ.लोगों ने आत्मदाह कियाआरक्षण लागू नहीं होगाआज क्या हाल है?
.वी.एम आई,नहीं जी हम नहीं जानतेअपना तो वोही परचा सिस्टम ठीक थाक्या आज विरोध है?
विरोध करना हमारा स्वभाव हैविरोध के स्वर में जागरूकता की गंध छुपी होती है
विश्वनाथ भाटी,तारानगर

Friday, April 2, 2010

कर्म और काल



मनुष्य सदैव वर्तमान से दु:खी ,अतीत के प्रति संतुष्ट और भविष्य को लेकर आशंकित रहता है वर्तमान में हम जिस से बात करें ,वह अपना दुखड़ा सुनाने के लिए आतुर मिलेगा हर किसी को लगता है कि उसका दुःख ही दुनिया का सबसे बड़ा दुःख है इस दुनिया में तरह -तरह के दुखी मिलेंगेअधिकतर को अपने पास नहीं होने का उतना दुःख नहीं जितना कि दूसरे के पास होने का हैलोग बेवजह दुखी हैउपकार करके सुखानुभूति करना बहुत कम के भाग्य में लिखा होता है
भविष्य को लेकर शंकित रहना मनुष्य का स्वभाव हैतभी तो अपने भविष्य को जानने कि उत्कट इच्छा मनुष्य के अंतर में पनपती रहती हैभविष्य फल को बदलने की भी भरपूर कोशिश करता है
अतीत चाहे कैसा ही गुजरा हो,सुखद लगता है। भूतकाल के कष्टमय क्षण भी वर्तमान में सुहाने लगते है ।
हम क्या करें? शायद कर्म करते रहें और फल प्रभु पर छोड़ते जाये। परमेश्वर सदैव शुभ संकल्पों से भरता रहे। विश्वनाथ भाटी तारानगर

Tuesday, March 30, 2010

संगठन के अनुभव

बोये कोई, काटे कोई
आदमी का उत्साह उसे विभिन्न संगठनों से जोड़ता हैशुरू में वहभाग- भाग कर काम करता हैविभिन्न संगठनों से जुड़ने के बाद अनुभव हुआ कि सभी लोग संगठन कि अहमियत नहीं समझते हैकाम करने कि चाहत भी सभी में नहीं होतीअकेला व्यक्ति भी अपने दम पर भागता रहकर कुछ दिन गतिविधियाँ चलाता रहता हैलोग जुड़ते नहीं पर इसका मतलब यह कदापि नहीं कि वे सो रहे हैंवे मुंदी आँखों से भी सब कुछ देख रहे होते हैंजब कोई अपनी मेहनत से पौधा लगाने में कामयाब हो जाता है उनकी आंखे खुल जाती हैं और वे पौधे के स्वामी बनकर धमकते हैंइतने दिन जिसने पौधे को खाद पानी दिया, जड़ों में पपनी सींचा ;आज वे उसकी जड़ें खोदेंगेकहाँ से आया पैसा,हिसाब देखेंगे ,किसी के बाप की बपौती नहीं है..... आदि आदि
यदि संगठन नहीं चला तो भी वे ही जीतेंगे। वे कहेंगे हमें तो पहले ही मालूम था। ऐसे कोई संगठन चलता है क्या?चलता तो हम नहीं जुड़ जाते क्या । अब आप उनसे यह मत पूछना कि आप ही बतादो फिर कैसे चलाना चाहिए। आपको निराशा के सिवाय कुछ नहीं मिलने वाला। वे अपना अनुभव आपको क्यों बताएँगे भला। अपना अनुभव खुद करो। विश्वनाथ भाटी,तारानगर [चुरू]