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Monday, November 15, 2010

बेवफा

      
लघुकथा



                                                     बेवफा 
     एक बार एक चिड़े ने चिड़ी से कहा,"मैं तुमसे कभी दूर नहीं होना चाहता हूँ. तुम मुझे छोड़कर कहीं उड़ मत जाना."
चिड़ी बोली,"यदि उड़ जाऊं तो तुम मुझे पकड़ लेना."
"पकड़ तो तुम्हे लूँगा मगर  इस तरह   मैं तुम्हें पा नहीं सकता."चिड़े ने रुआंसा होते हुए कहा.
तभी चिड़िया ने अपने सभी पंख नोच डाले और बोली,"लो अब मैं तुम्हारी हो चुकी.अब मैं कभी तुम्हें छोड़कर नहीं जा सकती." 
एक दिन जोरदार तूफ़ान उमड़ा.चिड़िया ने कहा,"मैं तो उड़ नहीं सकती पर तुम तो उड़ कर अपने प्राण बचा लो."
चिड़ा बोला ,"ठीक है,मगर तुम अपना ख़याल रखना." कहा कर वह उड़ गया.
तूफ़ान रुकने के बाद उसने आकर देखा ,चिड़िया मर चुकी थी.
वृक्ष की एक डाली पर खून से लिखा था,"काश!वो एक बार तो कहता कि मैं तुम्हें अकेली छोड़कर नहीं जा सकता.यदि वह ऐसा कर लेता तो कम से कम मैं तूफ़ान आने से पहले तो नहीं मरती."
                                                                                 प्रस्तुति  -विश्वनाथ भाटी ,तारानगर ९४१३८८८२०९






Saturday, May 8, 2010

तीर्थयात्रा

लघुकथा तीर्थयात्रा *विश्वनाथ भाटी " इस बार इच्छा है कि चारधाम कि यात्रा कर आऊं.सांसों का क्या भरोसा ,कब निकल जाये. "पार्वतीदेवी ने विजयबाबू के समक्ष अपनी बात रखी ."ठीक ही है अगर बेटा करवा रहा है तो कर ही आओ. "विजयबाबू ने अखबार का पन्ना पलटते हुए कहा. "ऐसा क्यों कहते हो,वो आपका बेटा नहीं है क्या ?""बेटा तो क्यों नहीं है मगर मैं उसे तुमसे ज्यादा जानता हूँ. इस बार भी कोई बहाना निकाल लेगा.""आपको भी है ना शक करने की आदत सी पड़ गयी है .पिछली बार तो ऐनमौके पर कंपनी का कामआ गया था वरना उसका तो पक्का पक्का मानस था.""मैं कब रोकता हूँ ,जाओ ना; यदि ले जाता है तो बढ़िया बात ही है""पोस्टमन..."गली में आवाज सुनाई दी .वह दौड़ी दौड़ी सी दरवाजे तक गयी .सुनील का ही ख़त था. उसकी आँखे चमक उठी ."यह लो ,सुनील का ख़त है शायद तीर्थयात्रा का समाचार भेजा हो."पार्वतीदेवी की नज़रें विजयबाबू के चेहरे पर टिक गयी."समाचार तो तीर्थयात्रा का ही है ,मगर किसी और का."विजयबाबू ने चश्मा अख़बार पर रखते हुए कहा. "और किसी का ;क्या मतलब?""लिखा है किअपने सास -ससुर को लेकर चारधाम कि यात्रा पर जा रहा हूँ.इस बार नहीं आ सकता .विचार मत करना .अचानक ही प्रोग्राम बन गया ."पार्वतीदेवी पत्थर बनी खुले पड़े ख़त को देखती जा रही थी. रसोईघर से सब्जी जलने कि गंध आ रही थी. विश्वनाथ भाटी ,वार्ड न ८,पो.तारानगर[चुरू] राजस्थान ०९४१३८८८२०९