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Saturday, November 13, 2010

माँ

                               माँ  
माँ ने जन्म दिया,
पाला-पोसा ,
माँ ने खुद गीले में सो कर सूखे में सुलाया,
माँ ने तुतला-तुतला कर बोलना सिखाया,
माँ ने डगमगाते कदमों को उंगली का सहारा दिया,
माँ ने रात-रातभर जागकर हमारी नींद को संजोया ,
माँ ने आँचल की ओट से दुनिया के ह बुरे साये को दूर रखा,
माँ ने बहू-बेटे की आरती उतारी,
बेटा अपनी दुनिया में खो गया,
समझदार जो हो गया है,
तरस गयी ममता, 
बरस गयी आँखे,
नहीं है समय जीवनदात्री के लिए,
व्यापार भी तो करना है .
माँ दिल से सोचती है,
बेटा दिमाग से.
                           रचयिता-      विश्वनाथ भाटी,तारानगर

Monday, August 9, 2010

क्षणिकाएं

तेरे लिए कहते सुनते 
खरी या खोटी
वाह री रोटी .
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मम्मी की झिडकी 
बेचारी लड़की 
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Saturday, May 8, 2010

वह मेरा भगवान नहीं है।

जिस पत्थर को पूजा करता वह मेरा भगवान नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं है॥
भाई भी बहनों को भूला ,बहनें भूली भाई को,
स्वार्थ की चक्की में पिसकरबच्चे भूले माई को,
पैसों की पर्तों में लिपटे रिश्तों की पहचान नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं है॥
सच्चाई का गला घोंटकर बढ़ा झूठ का मान यहाँ,
इंसानों का मोल घटा है,बिकता रोज ईमान यहाँ,
सच्ची बातें सुन ने वाले बचे यहाँ पर कान नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं है॥
khadi ro रही आज द्रौपदी,पर किसना की खबर नहीं है,
पांडव बनकर सब कुछ देदो,दुर्योधन को सब्र नहीं है,
भीष्म बने अन्याय गटक लो,गांडीव सूना,बाण नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं है॥
जाति,मज़हब ,उंच-नीच ने ,कतरा-कतरा इन्सान बांटा ,
सर गिन लो ,गिनते जाओगे ,पर सब पर छाया सन्नाटा,
लाशें ही लाशें दिखती हैं,मगर किसी में जान नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं है॥
बची हुई है इक चिंगारी ,दिल के कोई कोने में,
पा कर पवन पुनः सुलगेगी ,जोश भरेगी बौंने में,
दिल की बातें जिन्दा दिल से ,मुर्दों पर अरमान नहीं नहीं है।
इंसानों की बस्ती में भी आज कोई इन्सान नहीं हैं॥
विश्वनाथ भाटी,तारानगर,चुरू,राजस्थान। ३३१३०४ ०९४१३८८८२०९ ,01561-240973

Saturday, May 1, 2010

नमन

देश की मिटटी में जन्मे और इसी में मिल गए,
कीर्ति सौरभ लुटातेफिर सुमन से खिल गए,
आज कैसा लहलहाता ,चमचमाता यह चमन ,
अमर शहीदों को नमन
उन वीर सिंहों को नमन।
आस्था हर श्वांश में थी ,लक्ष्य ले बढ़ते कदम
बेड़िया लाख मात तेरी ,प्राण -अंतर में घुटा दम
ऐसी सुसंतान पा कर मुस्कराया यह वतन
अमर शहीदों को नमन
उन वीर सिंहों को नमन।
प्राण का दीपक जलाया ,आरती कण -कण सजी
माते तुम्हारी वंदना में ,श्वांश की झांझर बजी
बल दो की अर्पण कर सकूँ ,चरणों में तेरे सर सुमन
अमर शहीदों को नमन
उन वीर सिंहों को नमन ।
विश्वनाथ भाटी,तारानगर ,चुरू

Friday, April 30, 2010

लघु कविता

विश्व प्रसारण का प्रेमी
प्रेमिका से बोला तुम हो
तितली सी
लगती हो मुझे
बीबीसी.