Friday, November 19, 2010
माता कुमाता नहीं हो सकती .
विश्वनाथ भाटी ,तारानगर.
Monday, November 15, 2010
Tuesday, November 2, 2010
आतिशबाजी
Wednesday, October 13, 2010
शुभ-शुभ बोलो
Thursday, August 19, 2010
प्रशंसा
बॉस की झूठी प्रशंसा करते जीभ कांपती क्यों नहीं
जब जरुरत हो तो चूक जाते हैं
फिर से सोचें
Sunday, August 1, 2010
संविधान द्वारा मान्यता
Wednesday, May 12, 2010
पशुपालन

इन दिनों क्या आपने ध्यान दिया कि दूध के लिए पशुपालन से लोग कतराते हैं। कुछ हद तक सही भी है ,क्योंकि पशुपालन करना बहुत मुश्किल हो गया है। उनके लिए चारे की समस्या सबसे मोटी है। क्या करना है पशु रख कर। दूध मोल ले लेंगे । रोजाना की दूध की बन्धीवाला आधा किलो दूध अतिरिक्त नहीं दे सकता। फिर विवाह शादी में जितना मर्जी दूध,मावा,छन्ना कहाँ से आजाता है। आये दिन सिंथेटिक दूध के समाचार जानने को मिलते रहते हैं। क्या इस तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए?बेचारी गाय दर दर की मोहताज़ हो गयी।आओ कुछ सकारात्मक कदम उठायें.
Friday, May 7, 2010
विचारक शिव खेडा ने कहा है कि "जीतनेवाले कोई अलग काम नहीं करतें बल्कि वे हर काम को अलग ढंग से करते हैं।"जीतना सभी चाहते हैं,मगर जीत का मूल्य चुकाने के लिए कितने तैयार रहते हैं?वर्तमान सन्दर्भ में व्यक्ति के सामाजिक दृष्टिकोण में बहुत बदलाव आया है। घर कि नारी अर्थ कि दौड़ में जुड़ गयी है। कलदार कि खनक ने उसे भ्रम के भंवर में धकेल दिया है। मिटटी का दीया धरती से ही नफरत करने लगा।जीत कि हौड ने नारी को दहलीज़ से पराया बना डाला।
दिल की गहराईओं में डूब जाने की जरूरत है,
कितना मज़बूत है ईमान ,आजमाने की जरूरत है,
दुनिया को बदलने की चाह रखने वालो ,सुन लो,
गिरेबान में तो देखो,बदल जाने की जरूरत है।
रिश्तों की पहचान संवेदना में होती है,लेकिन आज रिश्ते भी बोझ बन गए हैं। दुनियाभर का वज़न लादे हम लोग रिश्तों का बोझ उठाने में थक से जाते हैं और जीवन बोझिल हो जाता हैं। दहलीज़ की परवाह छोड़ देने से अर्थ तो मज़बूत बन गया परन्तु रिश्ते दम तोड़ने लगे। यह हमारी जीत नहीं,करारी हर है। हम जीत का सफ़र दहलीज़ से ही शुरू करेंआशीष देने को तरसते हाथों को पैसो की नहीं,झुके हुए सिरों की जरूरत है।टूटे हुए दिलों में प्यार नहीं ठहरता।दहलीज़ की बगिया प्यार के फूलों से ही सुसज्जित होगी।
ख्वाहिशों की दौड़ में हम भावनाओं की मिठास ही खो बैठे।
ख्वाहिश ऐसी करो कि आसमां तक जा सको,
दुआ ऐसी करो कि खुदा को पा सको,
यूँ तो जीने के लिए पल बहुत कम है,
पर जीयो ऐसे कि हर पल में जिन्दगी को पा सको।
दिल जीतनेवाले तलवार वालो पर राज करते हैं। रिश्तों कि मिठास को पहचान कर ही दहलीज़ का मान रखा जा सकता हैं। घर के बड़े -छोटो को दी गयी इज्ज़त कई गुना बढ़कर वापस मिलती है। अर्थ की दौड़ में अनर्थ ना हो यही मनुष्यता की आवश्यकता है। जो दहलीज़ जीत गया ,संसार उसका है।दुनिया का सबसे बड़ा नुकसान वो है जो हमारी वजह से किसी की आँख में आंसू है। सबसे बड़ी उपलब्द्धि वो है जो किसी की आँख में आंसू हमारे लिए।
Thursday, May 6, 2010
Friday, April 30, 2010
काम और समय
विश्वनाथ भाटी ,तारानगर ९४१३८८८२०९
Saturday, April 10, 2010
विरोध का स्वर
मंडल आयोग आया। वी.पी.सिंह का विरोध हुआ.लोगों ने आत्मदाह किया। आरक्षण लागू नहीं होगा। आज क्या हाल है?
ई .वी.एम आई,नहीं जी हम नहीं जानते। अपना तो वोही परचा सिस्टम ठीक था। क्या आज विरोध है?
विरोध करना हमारा स्वभाव है। विरोध के स्वर में जागरूकता की गंध छुपी होती है।
विश्वनाथ भाटी,तारानगर
Friday, April 2, 2010
कर्म और काल
मनुष्य सदैव वर्तमान से दु:खी ,अतीत के प्रति संतुष्ट और भविष्य को लेकर आशंकित रहता है। वर्तमान में हम जिस से बात करें ,वह अपना दुखड़ा सुनाने के लिए आतुर मिलेगा। हर किसी को लगता है कि उसका दुःख ही दुनिया का सबसे बड़ा दुःख है। इस दुनिया में तरह -तरह के दुखी मिलेंगे। अधिकतर को अपने पास नहीं होने का उतना दुःख नहीं जितना कि दूसरे के पास होने का है। लोग बेवजह दुखी है। उपकार करके सुखानुभूति करना बहुत कम के भाग्य में लिखा होता है।
भविष्य को लेकर शंकित रहना मनुष्य का स्वभाव है। तभी तो अपने भविष्य को जानने कि उत्कट इच्छा मनुष्य के अंतर में पनपती रहती है। भविष्य फल को बदलने की भी भरपूर कोशिश करता है।
अतीत चाहे कैसा ही गुजरा हो,सुखद लगता है। भूतकाल के कष्टमय क्षण भी वर्तमान में सुहाने लगते है ।
हम क्या करें? शायद कर्म करते रहें और फल प्रभु पर छोड़ते जाये। परमेश्वर सदैव शुभ संकल्पों से भरता रहे। विश्वनाथ भाटी तारानगर
Tuesday, March 30, 2010
संगठन के अनुभव
आदमी का उत्साह उसे विभिन्न संगठनों से जोड़ता है। शुरू में वहभाग- भाग कर काम करता है। विभिन्न संगठनों से जुड़ने के बाद अनुभव हुआ कि सभी लोग संगठन कि अहमियत नहीं समझते है । काम करने कि चाहत भी सभी में नहीं होती। अकेला व्यक्ति भी अपने दम पर भागता रहकर कुछ दिन गतिविधियाँ चलाता रहता है। लोग जुड़ते नहीं पर इसका मतलब यह कदापि नहीं कि वे सो रहे हैं। वे मुंदी आँखों से भी सब कुछ देख रहे होते हैं। जब कोई अपनी मेहनत से पौधा लगाने में कामयाब हो जाता है उनकी आंखे खुल जाती हैं और वे पौधे के स्वामी बनकर आ धमकते हैं। इतने दिन जिसने पौधे को खाद पानी दिया, जड़ों में पपनी सींचा ;आज वे उसकी जड़ें खोदेंगे। कहाँ से आया पैसा,हिसाब देखेंगे ,किसी के बाप की बपौती नहीं है..... आदि आदि।
यदि संगठन नहीं चला तो भी वे ही जीतेंगे। वे कहेंगे हमें तो पहले ही मालूम था। ऐसे कोई संगठन चलता है क्या?चलता तो हम नहीं जुड़ जाते क्या । अब आप उनसे यह मत पूछना कि आप ही बतादो फिर कैसे चलाना चाहिए। आपको निराशा के सिवाय कुछ नहीं मिलने वाला। वे अपना अनुभव आपको क्यों बताएँगे भला। अपना अनुभव खुद करो। विश्वनाथ भाटी,तारानगर [चुरू]


