बोये कोई, काटे कोई
आदमी का उत्साह उसे विभिन्न संगठनों से जोड़ता है। शुरू में वहभाग- भाग कर काम करता है। विभिन्न संगठनों से जुड़ने के बाद अनुभव हुआ कि सभी लोग संगठन कि अहमियत नहीं समझते है । काम करने कि चाहत भी सभी में नहीं होती। अकेला व्यक्ति भी अपने दम पर भागता रहकर कुछ दिन गतिविधियाँ चलाता रहता है। लोग जुड़ते नहीं पर इसका मतलब यह कदापि नहीं कि वे सो रहे हैं। वे मुंदी आँखों से भी सब कुछ देख रहे होते हैं। जब कोई अपनी मेहनत से पौधा लगाने में कामयाब हो जाता है उनकी आंखे खुल जाती हैं और वे पौधे के स्वामी बनकर आ धमकते हैं। इतने दिन जिसने पौधे को खाद पानी दिया, जड़ों में पपनी सींचा ;आज वे उसकी जड़ें खोदेंगे। कहाँ से आया पैसा,हिसाब देखेंगे ,किसी के बाप की बपौती नहीं है..... आदि आदि।
यदि संगठन नहीं चला तो भी वे ही जीतेंगे। वे कहेंगे हमें तो पहले ही मालूम था। ऐसे कोई संगठन चलता है क्या?चलता तो हम नहीं जुड़ जाते क्या । अब आप उनसे यह मत पूछना कि आप ही बतादो फिर कैसे चलाना चाहिए। आपको निराशा के सिवाय कुछ नहीं मिलने वाला। वे अपना अनुभव आपको क्यों बताएँगे भला। अपना अनुभव खुद करो। विश्वनाथ भाटी,तारानगर [चुरू]
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