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Friday, August 20, 2010
तब नैना कछु और थे अब नैना कछु और
समाज में रहते हुए अनेक बार अपनी जरूरत के लिए दूसरों की मदद लेनी पडती है। रही बात रुपयों पैसों के लेनदेन की सो अधिक पैसेवाला हो या कम पैसोंवाला सबको ही जरुरत पडती रहती है।इस विषय में जो विचारणीय बात है वह यह कि तब नैना कछु और थे अब नैना कछु और अर्थात्ा जरुरत पडने और जरुरत पूरी होने के बाद नैन पलट जाते हैं। मेरे भाई साहब ने बताया कि व्यवहार कमाना पडता है। लेने के समय किया गया वादा देने के वक्त भी याद रहना चाहिए। वादा करते समय अपनी क्षमता का आकलन कर लेना अच्छा रहता है। वादे पर खरा उतर कर अपना व्यवहार बना रह जाता है। यदि मजबूरी हो भी जाए तो उस व्यक्ति को छोडकर बाकी पूरी दुनिया आपके सामने है। इससे उस व्यक्ति के सामने हमारा वचन खडा रह जाता है। एक बार आजमा कर तो देख लीजिए। विश्वनाथ भाटी तारानगर
Monday, March 29, 2010
बड़े भाई की सीख
बात तब की है जब मैंने पुस्तकालय में नया नया खाता खुलवाया ही था। रोज-रोज नयी -नयी किताबे पढना,उन पर चर्चा करना और बापूजी से जानकारी लेना नित्यकर्म ही बन गया था। जल्दी से जल्दी किताब पूरी करने की ललक रहती थी। इसी क्रम में उस दिन मैं किताब लेकर आया और पढने बैठ गया। बड़े भाई साहब स्व० श्री धनराज भाटी की नज़र मुझ पर पड़ी। मुझे इशारे से अपने पास बुलाया।
"क्या कर रहे हो?"
"किताब पढ़ रहा हूँ।"
"इतने पन्ने पलट क्यों दिए?"
"ये सब बकवास है.किताब की कहानी तो यहाँ से ही शुरू हो रही है। "मैंने स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया।
"जानते हो यह किताब लेखक ने क्यों लिखी?"
"नहीं तो.पर इस से मुझे क्या?"मैंने बात साफ की।
"एक बात ध्यान से सुनो। प्रण करो की आज के बाद कभी किताब पढने की शुरुआत इस तरह नहीं करोगे। किताब की भूमिका पढ़े बिना किताब पढनी शुरू करना उस किताब,उसके लेखक और माँ सरस्वती का अपमान है। सुनो ,यदि तुम्हारे पास किताब पढने का पूरा समय नहीं हो तो भी उसकी भूमिका तो जरुर पढ़ लेना। "
मैं कुछ समझा,कुछ नहीं समझा मगर आज उस सीख का महत्त्व बखूबी समझ आ रहा है। आज भी कई लोग किताब को मेरे पुराने तरीके से ही पढना शुरू करते है। एक बार तरीका आजमा कर देखने में क्या हर्ज़ है.मेरे भाई की बात मानकर ही सही ,बस एक बार यह आदत डालो तो सही।
विश्वनाथ भाटी,तारानगर 9413888209
बात तब की है जब मैंने पुस्तकालय में नया नया खाता खुलवाया ही था। रोज-रोज नयी -नयी किताबे पढना,उन पर चर्चा करना और बापूजी से जानकारी लेना नित्यकर्म ही बन गया था। जल्दी से जल्दी किताब पूरी करने की ललक रहती थी। इसी क्रम में उस दिन मैं किताब लेकर आया और पढने बैठ गया। बड़े भाई साहब स्व० श्री धनराज भाटी की नज़र मुझ पर पड़ी। मुझे इशारे से अपने पास बुलाया।
"क्या कर रहे हो?"
"किताब पढ़ रहा हूँ।"
"इतने पन्ने पलट क्यों दिए?"
"ये सब बकवास है.किताब की कहानी तो यहाँ से ही शुरू हो रही है। "मैंने स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया।
"जानते हो यह किताब लेखक ने क्यों लिखी?"
"नहीं तो.पर इस से मुझे क्या?"मैंने बात साफ की।
"एक बात ध्यान से सुनो। प्रण करो की आज के बाद कभी किताब पढने की शुरुआत इस तरह नहीं करोगे। किताब की भूमिका पढ़े बिना किताब पढनी शुरू करना उस किताब,उसके लेखक और माँ सरस्वती का अपमान है। सुनो ,यदि तुम्हारे पास किताब पढने का पूरा समय नहीं हो तो भी उसकी भूमिका तो जरुर पढ़ लेना। "
मैं कुछ समझा,कुछ नहीं समझा मगर आज उस सीख का महत्त्व बखूबी समझ आ रहा है। आज भी कई लोग किताब को मेरे पुराने तरीके से ही पढना शुरू करते है। एक बार तरीका आजमा कर देखने में क्या हर्ज़ है.मेरे भाई की बात मानकर ही सही ,बस एक बार यह आदत डालो तो सही।
विश्वनाथ भाटी,तारानगर 9413888209
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