विचारक शिव खेडा ने कहा है कि "जीतने वाले कोई अलग काम नहीं करते बल्कि वे हार काम को अलग ढंग से करते हैं।"जीतना सभी चाहते हैं ,मगर जीत का मूल्य चुकाने के लिए कितने तैयार रहते हैं?वर्तमान सन्दर्भ में सामाजिक दृष्टिकोण में बहुत बदलाव आया है। घर की नारी दहलीज़ लांघकर अर्थ की दौड़ में जुड़ गयी है। कलदार की खनक ने उसे भ्रम के भंवर में धकेल दीया है। मिटटी का दीया धरती से ही नफरत करने लगा है। जीत की हौड ने नारी और दहलीज़ के बीच परायेपन की दीवार खींच दी है।
दिल की गहराइयों में डूब जाने की जरूरत है,
कितना मज़बूत है ईमान,आजमाने की जरूरत है,
दुनिया को बदलने की चाह रखनेवालों,सुनो,
गिरेबान में तो देखो,बदल जाने की जरूरत है।
रिश्तों की जान संवेदना में होती है,लेकिन आज रिश्ते भी बोझ बन गए हैं। दुनियाभर का वज़न लादे हम लोग रिश्तों का बोझ उठाने में थक से जाते हैं और जीवन बोझिल हो जाता है। आज दहलीज़ परायी बनती जा रही है। संवेदना शून्य समाज में अर्थ ही सब कुछ बनता जा रहा है। मगर यह तो देखें कि दिलों की अनदेखी करके अगर जग भी जीता तो क्या जीता।जीत की चाह रखना बुरा नहीं पर जीत के लिए आधार को ही भूल जाना चिंता का विषय जरूर है। दहलीज़ का प्यार ही संसार की विशालता के दर्शन करवा सकता है।सौदा महंगा भी नहीं। दहलीज़ के बड़े -बूढ़े हाथ पैसों की नहीं झुके; हुए सिरों की चाह रखते हैं। जिसने दिल जीतने का हूनर सीख लिया,वह संसार का सबसे बड़ा विजेता है। दिल जीतनेवाले तलवार वालों पर राज करते हैं।
इन दिनों दहलीज़ की अनदेखी ने विशेषकर नारी को एक ऐसे गर्त में धकेल दिया है,जहाँ आत्मिक आनंद को कभी नहीं पाया जा सकता। जीत के सफ़र की शुरुआत दहलीज़ से ही करें।कहा भी गया है कि दुनिया का सबसे बड़ा नुकसान वो है कि किसी आँखों में आंसू हमारी वजह से। दुनिया की सबसे बड़ी उपलब्द्धि यही है कि किसी की आँखों में आंसू हमारे लिए। मन के छलावे में आकर आत्मा के आनंद को भुला देना समझदारी नहीं कही जा sakti
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