Friday, April 2, 2010

कर्म और काल



मनुष्य सदैव वर्तमान से दु:खी ,अतीत के प्रति संतुष्ट और भविष्य को लेकर आशंकित रहता है वर्तमान में हम जिस से बात करें ,वह अपना दुखड़ा सुनाने के लिए आतुर मिलेगा हर किसी को लगता है कि उसका दुःख ही दुनिया का सबसे बड़ा दुःख है इस दुनिया में तरह -तरह के दुखी मिलेंगेअधिकतर को अपने पास नहीं होने का उतना दुःख नहीं जितना कि दूसरे के पास होने का हैलोग बेवजह दुखी हैउपकार करके सुखानुभूति करना बहुत कम के भाग्य में लिखा होता है
भविष्य को लेकर शंकित रहना मनुष्य का स्वभाव हैतभी तो अपने भविष्य को जानने कि उत्कट इच्छा मनुष्य के अंतर में पनपती रहती हैभविष्य फल को बदलने की भी भरपूर कोशिश करता है
अतीत चाहे कैसा ही गुजरा हो,सुखद लगता है। भूतकाल के कष्टमय क्षण भी वर्तमान में सुहाने लगते है ।
हम क्या करें? शायद कर्म करते रहें और फल प्रभु पर छोड़ते जाये। परमेश्वर सदैव शुभ संकल्पों से भरता रहे। विश्वनाथ भाटी तारानगर

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