Friday, April 30, 2010

लघु कविता

विश्व प्रसारण का प्रेमी
प्रेमिका से बोला तुम हो
तितली सी
लगती हो मुझे
बीबीसी.

काम और समय

आदमी को काम कीअधिकता नहीं मारती बल्कि काम की अनियमितता मार डालती है। काम को सही समय पर पूरा करने के लिए समय का नियोजन आना बहुत जरुरी है। चार तरह के काम हमे करने होते हैं। १.वो काम जो हमे ही करने पड़ेंगे ,जैसे -नहाना,सोना,शौच जाना आदि। २.वो काम जो जरुरी हैं जैसे-ड्यूटी पर जाना,बच्चों को स्कूल छोड़नाबीमार होने पर दवाई लेना आदि। ३.तीसरे तरह के काम आदत से जुड़े होते हैं,जैसे टीवी देखना,देर तक सोना । ४.रूचि के काम सिनेमा जाना,क्रिकेट खेलना आदि। जब हम कोई विशेष लक्ष्य के लिए आगे बढ़ रहे हैं तो एक बार हमें क्रमांक ३ व ४ को स्थगित करना होगा। अपने सबसे अच्छे समय में हम जरुरी और महत्वपूर्ण काम काम पूरे करें। समय का मूल्य समझेंगे तो समय हमारा मूल्य बनाये रखेगा।
विश्वनाथ भाटी ,तारानगर ९४१३८८८२०९

Friday, April 16, 2010

कविता


तेरे लिए कहते,सुनते
खरी या खोटी ,
वाह री रोटी।


मम्मी की झिडकी
बेचारी लड़की

लंका
सोने की थी
तभी तो
कुम्भकरण जैसे लोग
सोये रहते थे

क्या कहूँ मैं
इस कमी को
पी रही है शराब
आदमी को


Saturday, April 10, 2010

विरोध का स्वर

भारत में पहले हर बात का विरोध होता है,फिर उसी का समर्थन भी होता हैजब राजीव गाँधी कहते थे "हम देश को २१ वीं सदी में ले जायेंगे, देश में कंप्यूटर क्रांति आएगी,देश तेज गति से आगे बढेगा आदि ..."तो उनकी बातो का विरोध होता थाक्या आज है?
मंडल आयोग आयावी.पी.सिंह का विरोध हुआ.लोगों ने आत्मदाह कियाआरक्षण लागू नहीं होगाआज क्या हाल है?
.वी.एम आई,नहीं जी हम नहीं जानतेअपना तो वोही परचा सिस्टम ठीक थाक्या आज विरोध है?
विरोध करना हमारा स्वभाव हैविरोध के स्वर में जागरूकता की गंध छुपी होती है
विश्वनाथ भाटी,तारानगर

Friday, April 2, 2010

कर्म और काल



मनुष्य सदैव वर्तमान से दु:खी ,अतीत के प्रति संतुष्ट और भविष्य को लेकर आशंकित रहता है वर्तमान में हम जिस से बात करें ,वह अपना दुखड़ा सुनाने के लिए आतुर मिलेगा हर किसी को लगता है कि उसका दुःख ही दुनिया का सबसे बड़ा दुःख है इस दुनिया में तरह -तरह के दुखी मिलेंगेअधिकतर को अपने पास नहीं होने का उतना दुःख नहीं जितना कि दूसरे के पास होने का हैलोग बेवजह दुखी हैउपकार करके सुखानुभूति करना बहुत कम के भाग्य में लिखा होता है
भविष्य को लेकर शंकित रहना मनुष्य का स्वभाव हैतभी तो अपने भविष्य को जानने कि उत्कट इच्छा मनुष्य के अंतर में पनपती रहती हैभविष्य फल को बदलने की भी भरपूर कोशिश करता है
अतीत चाहे कैसा ही गुजरा हो,सुखद लगता है। भूतकाल के कष्टमय क्षण भी वर्तमान में सुहाने लगते है ।
हम क्या करें? शायद कर्म करते रहें और फल प्रभु पर छोड़ते जाये। परमेश्वर सदैव शुभ संकल्पों से भरता रहे। विश्वनाथ भाटी तारानगर

Tuesday, March 30, 2010

संगठन के अनुभव

बोये कोई, काटे कोई
आदमी का उत्साह उसे विभिन्न संगठनों से जोड़ता हैशुरू में वहभाग- भाग कर काम करता हैविभिन्न संगठनों से जुड़ने के बाद अनुभव हुआ कि सभी लोग संगठन कि अहमियत नहीं समझते हैकाम करने कि चाहत भी सभी में नहीं होतीअकेला व्यक्ति भी अपने दम पर भागता रहकर कुछ दिन गतिविधियाँ चलाता रहता हैलोग जुड़ते नहीं पर इसका मतलब यह कदापि नहीं कि वे सो रहे हैंवे मुंदी आँखों से भी सब कुछ देख रहे होते हैंजब कोई अपनी मेहनत से पौधा लगाने में कामयाब हो जाता है उनकी आंखे खुल जाती हैं और वे पौधे के स्वामी बनकर धमकते हैंइतने दिन जिसने पौधे को खाद पानी दिया, जड़ों में पपनी सींचा ;आज वे उसकी जड़ें खोदेंगेकहाँ से आया पैसा,हिसाब देखेंगे ,किसी के बाप की बपौती नहीं है..... आदि आदि
यदि संगठन नहीं चला तो भी वे ही जीतेंगे। वे कहेंगे हमें तो पहले ही मालूम था। ऐसे कोई संगठन चलता है क्या?चलता तो हम नहीं जुड़ जाते क्या । अब आप उनसे यह मत पूछना कि आप ही बतादो फिर कैसे चलाना चाहिए। आपको निराशा के सिवाय कुछ नहीं मिलने वाला। वे अपना अनुभव आपको क्यों बताएँगे भला। अपना अनुभव खुद करो। विश्वनाथ भाटी,तारानगर [चुरू]
उठा था ख्याल दिल में कि याद खुदा करेंगे, मगर फिर याद आया की रोटी नहीं मिली तो क्या करेंगे
वक़्त का कटु सत्य। जिसके पास चने है उसके पास चबाने के लिए दाँत नहीं और दाँत वाले चनों का इंतजार करते रह जाते हैं। समानता का नारा दिया जाता है पर समाज की जटिलता ही ऐसी है कि इसे स्थापित नहीं किया जा रहा।
कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू ......... । विश्वनाथ भाटी,तारानगर

Monday, March 29, 2010

जियो तो ऐसे जियो की कहानियों में ढल जाओ,
मरो तो ऐसे मरो की मोक्ष की परिभाषा बदल जाये
लेनदेन
लेनदेन संसार का शाश्वत नियम हैहर छोटे -बड़े को अपने-अपने तरह से लेनदेन करना ही पड़ता हैफिर वह लेनदेन चाहे रूपये-पैसे का हो,किताबों का हो या विचारों का होपर एक चिंतन का विषय है कि लेनदेन के मामले में लोग असफल क्यों हो जाते हैशायद वे इसे गंभीरता से नहीं लेतेकिसी से धन उधार लेते समय मीठी -मीठी बातें,रिश्तों की दुहाई ,जल्दी ही लौटा देने का वादा आदि आम बात है और फिर .................भी आम बात हैक्यों?साफ-साफ क्यों नहीं कहा जाताबनावटीपन का दुशाला क्यों ओढा जाता हैचार दिन का वायदा चार साल में क्यों बदल जाता है?हम क्या तुम्हारा रुपया खानेवाले लगते है,जरुरत में ले लिया तो कौनसा गुनाह कर दियादे देंगे धीरे -धीरेफिर तुम्हारे पास कौनसी कमी थोड़े ही है
किताब के मामले में भी सौ में से नब्बे फ़ैल हो जाते हैकिताब पढ़ते ही सुरक्षित पहुँचाने की बात हवा होते देर नहीं लगतीज्यादातर मामलों में तो किताब लौटकर आती ही नहीं,और आती भी है तो अपने बिगड़े हुए अस्तित्व के साथ देखकर कहने को मन करता है "बेचारी किताब"।
व्यवहार में पारदर्शिता लाने के लिए प्रयत्न करने की जरुरत हैकिसी को रुपया-पैसा अमुक तिथि को लौटाने का वचन दिया हो तो उस वचन की लाज रखने की चिंता भी हमें ही करनी चाहिए
विश्वनाथ भाटी ;तारानगर[चुरू]९४१३८८८२०९
बड़े भाई की सीख
बात तब की है जब मैंने पुस्तकालय में नया नया खाता खुलवाया ही थारोज-रोज नयी -नयी किताबे पढना,उन पर चर्चा करना और बापूजी से जानकारी लेना नित्यकर्म ही बन गया थाजल्दी से जल्दी किताब पूरी करने की ललक रहती थीइसी क्रम में उस दिन मैं किताब लेकर आया और पढने बैठ गयाबड़े भाई साहब स्व श्री धनराज भाटी की नज़र मुझ पर पड़ीमुझे इशारे से अपने पास बुलाया
"क्या कर रहे हो?"
"किताब पढ़ रहा हूँ।"
"इतने पन्ने पलट क्यों दिए?"
"ये सब बकवास है.किताब की कहानी तो यहाँ से ही शुरू हो रही है। "मैंने स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया
"जानते हो यह किताब लेखक ने क्यों लिखी?"
"नहीं तो.पर इस से मुझे क्या?"मैंने बात साफ की
"एक बात ध्यान से सुनोप्रण करो की आज के बाद कभी किताब पढने की शुरुआत इस तरह नहीं करोगेकिताब की भूमिका पढ़े बिना किताब पढनी शुरू करना उस किताब,उसके लेखक और माँ सरस्वती का अपमान हैसुनो ,यदि तुम्हारे पास किताब पढने का पूरा समय नहीं हो तो भी उसकी भूमिका तो जरुर पढ़ लेना। "
मैं कुछ समझा,कुछ नहीं समझा मगर आज उस सीख का महत्त्व बखूबी समझ रहा हैआज भी कई लोग किताब को मेरे पुराने तरीके से ही पढना शुरू करते हैएक बार तरीका आजमा कर देखने में क्या हर्ज़ है.मेरे भाई की बात मानकर ही सही ,बस एक बार यह आदत डालो तो सही
विश्वनाथ
भाटी,तारानगर 9413888209

Sunday, March 28, 2010

कहाँ गये वो दिन?

बचपन की यादें
बचपन की दुनिया भी कितनी रंग बिरंगी होती हैतरह तरह के विचार मन में उमड़ घुमड़ करते रहते थे । हर एक नई वस्तु आकर्षण का बिंदु हुआ करती थी। मेरे बचपन के समय मनोरंजन के आज के इतने साधन नहीं हुआ करते थे। हम माचिश की डिब्बी के लेबेल,टूटी हुई चूड़ियाँ,खजूर की गुठलियाँ ,इमली के बीज ,कांच की गोलियां आदि को अपनी खेल की सामग्री बनाकर बहुत खुश थे। रूठना ,मनाना,झगड़ना,बतियाना आदि हमारी दिनचर्या का भाग था। यदि किसी बात पर झगड़ भी लिए तो लड़ाई आजकल की तरह परिवारों में नहीं जाती थी।
आज बचपन सिमटकर बेडरूम तक गया हैगली में खेलना असभ्यता बन गया हैकांच की गोलियों का स्थान वीडियो गेम के रिमोट ने ले लियाबच्चों के नाम पर बड़ों का अहंकार टकरा रहा हैगाँव की चौपाल सिमट कर घर की बंद दरवाजे वाली बैठक बन गयीघर का बुजुर्ग घर की चार दिवारी में घुट घुट कर मर रहा हैबेटों को बाप के पास बैठने की फुर्सत नहींपोता अपने वजन से भी भारी बस्ता लिए भाग कर स्कुल बस पकड़ रहा हैबच्चा जल्दी ही बड़ा हो गया हैवह दादा की झोली में बैठकर कहानी सुनने का हक़ खो चुका हैउसकी मम्मी जल्दी से उसे होमवर्क करवाकर सुला देना चाहती हैदादा के पास रहने पर बच्चे में बिगड़ने का दर मम्मी को हरदम सताता रहता है
कहाँ गये वो दिन?