लेनदेन
लेनदेन संसार का शाश्वत नियम है। हर छोटे -बड़े को अपने-अपने तरह से लेनदेन करना ही पड़ता है। फिर वह लेनदेन चाहे रूपये-पैसे का हो,किताबों का हो या विचारों का हो। पर एक चिंतन का विषय है कि लेनदेन के मामले में लोग असफल क्यों हो जाते है। शायद वे इसे गंभीरता से नहीं लेते। किसी से धन उधार लेते समय मीठी -मीठी बातें,रिश्तों की दुहाई ,जल्दी ही लौटा देने का वादा आदि आम बात है और फिर .................भी आम बात है। क्यों?साफ-साफ क्यों नहीं कहा जाता। बनावटीपन का दुशाला क्यों ओढा जाता है। चार दिन का वायदा चार साल में क्यों बदल जाता है?हम क्या तुम्हारा रुपया खानेवाले लगते है,जरुरत में ले लिया तो कौनसा गुनाह कर दिया। दे देंगे धीरे -धीरे । फिर तुम्हारे पास कौनसी कमी थोड़े ही है।
किताब के मामले में भी सौ में से नब्बे फ़ैल हो जाते है। किताब पढ़ते ही सुरक्षित पहुँचाने की बात हवा होते देर नहीं लगती । ज्यादातर मामलों में तो किताब लौटकर आती ही नहीं,और आती भी है तो अपने बिगड़े हुए अस्तित्व के साथ देखकर कहने को मन करता है "बेचारी किताब"।
व्यवहार में पारदर्शिता लाने के लिए प्रयत्न करने की जरुरत है। किसी को रुपया-पैसा अमुक तिथि को लौटाने का वचन दिया हो तो उस वचन की लाज रखने की चिंता भी हमें ही करनी चाहिए।
विश्वनाथ भाटी ;तारानगर[चुरू]९४१३८८८२०९
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