बचपन की यादें
बचपन की दुनिया भी कितनी रंग बिरंगी होती है । तरह तरह के विचार मन में उमड़ घुमड़ करते रहते थे । हर एक नई वस्तु आकर्षण का बिंदु हुआ करती थी। मेरे बचपन के समय मनोरंजन के आज के इतने साधन नहीं हुआ करते थे। हम माचिश की डिब्बी के लेबेल,टूटी हुई चूड़ियाँ,खजूर की गुठलियाँ ,इमली के बीज ,कांच की गोलियां आदि को अपनी खेल की सामग्री बनाकर बहुत खुश थे। रूठना ,मनाना,झगड़ना,बतियाना आदि हमारी दिनचर्या का भाग था। यदि किसी बात पर झगड़ भी लिए तो लड़ाई आजकल की तरह परिवारों में नहीं जाती थी।
आज बचपन सिमटकर बेडरूम तक आ गया है। गली में खेलना असभ्यता बन गया है। कांच की गोलियों का स्थान वीडियो गेम के रिमोट ने ले लिया। बच्चों के नाम पर बड़ों का अहंकार टकरा रहा है। गाँव की चौपाल सिमट कर घर की बंद दरवाजे वाली बैठक बन गयी। घर का बुजुर्ग घर की चार दिवारी में घुट घुट कर मर रहा है। बेटों को बाप के पास बैठने की फुर्सत नहीं। पोता अपने वजन से भी भारी बस्ता लिए भाग कर स्कुल बस पकड़ रहा है। बच्चा जल्दी ही बड़ा हो गया है। वह दादा की झोली में बैठकर कहानी सुनने का हक़ खो चुका है। उसकी मम्मी जल्दी से उसे होमवर्क करवाकर सुला देना चाहती है। दादा के पास रहने पर बच्चे में बिगड़ने का दर मम्मी को हरदम सताता रहता है।
कहाँ गये वो दिन?
1 comment:
अच्छी पोस्ट है, बधाई।
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