बड़े भाई की सीख
बात तब की है जब मैंने पुस्तकालय में नया नया खाता खुलवाया ही था। रोज-रोज नयी -नयी किताबे पढना,उन पर चर्चा करना और बापूजी से जानकारी लेना नित्यकर्म ही बन गया था। जल्दी से जल्दी किताब पूरी करने की ललक रहती थी। इसी क्रम में उस दिन मैं किताब लेकर आया और पढने बैठ गया। बड़े भाई साहब स्व० श्री धनराज भाटी की नज़र मुझ पर पड़ी। मुझे इशारे से अपने पास बुलाया।
"क्या कर रहे हो?"
"किताब पढ़ रहा हूँ।"
"इतने पन्ने पलट क्यों दिए?"
"ये सब बकवास है.किताब की कहानी तो यहाँ से ही शुरू हो रही है। "मैंने स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया।
"जानते हो यह किताब लेखक ने क्यों लिखी?"
"नहीं तो.पर इस से मुझे क्या?"मैंने बात साफ की।
"एक बात ध्यान से सुनो। प्रण करो की आज के बाद कभी किताब पढने की शुरुआत इस तरह नहीं करोगे। किताब की भूमिका पढ़े बिना किताब पढनी शुरू करना उस किताब,उसके लेखक और माँ सरस्वती का अपमान है। सुनो ,यदि तुम्हारे पास किताब पढने का पूरा समय नहीं हो तो भी उसकी भूमिका तो जरुर पढ़ लेना। "
मैं कुछ समझा,कुछ नहीं समझा मगर आज उस सीख का महत्त्व बखूबी समझ आ रहा है। आज भी कई लोग किताब को मेरे पुराने तरीके से ही पढना शुरू करते है। एक बार तरीका आजमा कर देखने में क्या हर्ज़ है.मेरे भाई की बात मानकर ही सही ,बस एक बार यह आदत डालो तो सही।
विश्वनाथ भाटी,तारानगर 9413888209
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