बोये कोई, काटे कोई
आदमी का उत्साह उसे विभिन्न संगठनों से जोड़ता है। शुरू में वहभाग- भाग कर काम करता है। विभिन्न संगठनों से जुड़ने के बाद अनुभव हुआ कि सभी लोग संगठन कि अहमियत नहीं समझते है । काम करने कि चाहत भी सभी में नहीं होती। अकेला व्यक्ति भी अपने दम पर भागता रहकर कुछ दिन गतिविधियाँ चलाता रहता है। लोग जुड़ते नहीं पर इसका मतलब यह कदापि नहीं कि वे सो रहे हैं। वे मुंदी आँखों से भी सब कुछ देख रहे होते हैं। जब कोई अपनी मेहनत से पौधा लगाने में कामयाब हो जाता है उनकी आंखे खुल जाती हैं और वे पौधे के स्वामी बनकर आ धमकते हैं। इतने दिन जिसने पौधे को खाद पानी दिया, जड़ों में पपनी सींचा ;आज वे उसकी जड़ें खोदेंगे। कहाँ से आया पैसा,हिसाब देखेंगे ,किसी के बाप की बपौती नहीं है..... आदि आदि।
यदि संगठन नहीं चला तो भी वे ही जीतेंगे। वे कहेंगे हमें तो पहले ही मालूम था। ऐसे कोई संगठन चलता है क्या?चलता तो हम नहीं जुड़ जाते क्या । अब आप उनसे यह मत पूछना कि आप ही बतादो फिर कैसे चलाना चाहिए। आपको निराशा के सिवाय कुछ नहीं मिलने वाला। वे अपना अनुभव आपको क्यों बताएँगे भला। अपना अनुभव खुद करो। विश्वनाथ भाटी,तारानगर [चुरू]
Tuesday, March 30, 2010
उठा था ख्याल दिल में कि याद ऐ खुदा करेंगे, मगर फिर याद आया की रोटी नहीं मिली तो क्या करेंगे।
वक़्त का कटु सत्य। जिसके पास चने है उसके पास चबाने के लिए दाँत नहीं और दाँत वाले चनों का इंतजार करते रह जाते हैं। समानता का नारा दिया जाता है पर समाज की जटिलता ही ऐसी है कि इसे स्थापित नहीं किया जा रहा।
कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू ......... । विश्वनाथ भाटी,तारानगर
वक़्त का कटु सत्य। जिसके पास चने है उसके पास चबाने के लिए दाँत नहीं और दाँत वाले चनों का इंतजार करते रह जाते हैं। समानता का नारा दिया जाता है पर समाज की जटिलता ही ऐसी है कि इसे स्थापित नहीं किया जा रहा।
कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू ......... । विश्वनाथ भाटी,तारानगर
Monday, March 29, 2010
लेनदेन
लेनदेन संसार का शाश्वत नियम है। हर छोटे -बड़े को अपने-अपने तरह से लेनदेन करना ही पड़ता है। फिर वह लेनदेन चाहे रूपये-पैसे का हो,किताबों का हो या विचारों का हो। पर एक चिंतन का विषय है कि लेनदेन के मामले में लोग असफल क्यों हो जाते है। शायद वे इसे गंभीरता से नहीं लेते। किसी से धन उधार लेते समय मीठी -मीठी बातें,रिश्तों की दुहाई ,जल्दी ही लौटा देने का वादा आदि आम बात है और फिर .................भी आम बात है। क्यों?साफ-साफ क्यों नहीं कहा जाता। बनावटीपन का दुशाला क्यों ओढा जाता है। चार दिन का वायदा चार साल में क्यों बदल जाता है?हम क्या तुम्हारा रुपया खानेवाले लगते है,जरुरत में ले लिया तो कौनसा गुनाह कर दिया। दे देंगे धीरे -धीरे । फिर तुम्हारे पास कौनसी कमी थोड़े ही है।
किताब के मामले में भी सौ में से नब्बे फ़ैल हो जाते है। किताब पढ़ते ही सुरक्षित पहुँचाने की बात हवा होते देर नहीं लगती । ज्यादातर मामलों में तो किताब लौटकर आती ही नहीं,और आती भी है तो अपने बिगड़े हुए अस्तित्व के साथ देखकर कहने को मन करता है "बेचारी किताब"।
व्यवहार में पारदर्शिता लाने के लिए प्रयत्न करने की जरुरत है। किसी को रुपया-पैसा अमुक तिथि को लौटाने का वचन दिया हो तो उस वचन की लाज रखने की चिंता भी हमें ही करनी चाहिए।
विश्वनाथ भाटी ;तारानगर[चुरू]९४१३८८८२०९
लेनदेन संसार का शाश्वत नियम है। हर छोटे -बड़े को अपने-अपने तरह से लेनदेन करना ही पड़ता है। फिर वह लेनदेन चाहे रूपये-पैसे का हो,किताबों का हो या विचारों का हो। पर एक चिंतन का विषय है कि लेनदेन के मामले में लोग असफल क्यों हो जाते है। शायद वे इसे गंभीरता से नहीं लेते। किसी से धन उधार लेते समय मीठी -मीठी बातें,रिश्तों की दुहाई ,जल्दी ही लौटा देने का वादा आदि आम बात है और फिर .................भी आम बात है। क्यों?साफ-साफ क्यों नहीं कहा जाता। बनावटीपन का दुशाला क्यों ओढा जाता है। चार दिन का वायदा चार साल में क्यों बदल जाता है?हम क्या तुम्हारा रुपया खानेवाले लगते है,जरुरत में ले लिया तो कौनसा गुनाह कर दिया। दे देंगे धीरे -धीरे । फिर तुम्हारे पास कौनसी कमी थोड़े ही है।
किताब के मामले में भी सौ में से नब्बे फ़ैल हो जाते है। किताब पढ़ते ही सुरक्षित पहुँचाने की बात हवा होते देर नहीं लगती । ज्यादातर मामलों में तो किताब लौटकर आती ही नहीं,और आती भी है तो अपने बिगड़े हुए अस्तित्व के साथ देखकर कहने को मन करता है "बेचारी किताब"।
व्यवहार में पारदर्शिता लाने के लिए प्रयत्न करने की जरुरत है। किसी को रुपया-पैसा अमुक तिथि को लौटाने का वचन दिया हो तो उस वचन की लाज रखने की चिंता भी हमें ही करनी चाहिए।
विश्वनाथ भाटी ;तारानगर[चुरू]९४१३८८८२०९
बड़े भाई की सीख
बात तब की है जब मैंने पुस्तकालय में नया नया खाता खुलवाया ही था। रोज-रोज नयी -नयी किताबे पढना,उन पर चर्चा करना और बापूजी से जानकारी लेना नित्यकर्म ही बन गया था। जल्दी से जल्दी किताब पूरी करने की ललक रहती थी। इसी क्रम में उस दिन मैं किताब लेकर आया और पढने बैठ गया। बड़े भाई साहब स्व० श्री धनराज भाटी की नज़र मुझ पर पड़ी। मुझे इशारे से अपने पास बुलाया।
"क्या कर रहे हो?"
"किताब पढ़ रहा हूँ।"
"इतने पन्ने पलट क्यों दिए?"
"ये सब बकवास है.किताब की कहानी तो यहाँ से ही शुरू हो रही है। "मैंने स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया।
"जानते हो यह किताब लेखक ने क्यों लिखी?"
"नहीं तो.पर इस से मुझे क्या?"मैंने बात साफ की।
"एक बात ध्यान से सुनो। प्रण करो की आज के बाद कभी किताब पढने की शुरुआत इस तरह नहीं करोगे। किताब की भूमिका पढ़े बिना किताब पढनी शुरू करना उस किताब,उसके लेखक और माँ सरस्वती का अपमान है। सुनो ,यदि तुम्हारे पास किताब पढने का पूरा समय नहीं हो तो भी उसकी भूमिका तो जरुर पढ़ लेना। "
मैं कुछ समझा,कुछ नहीं समझा मगर आज उस सीख का महत्त्व बखूबी समझ आ रहा है। आज भी कई लोग किताब को मेरे पुराने तरीके से ही पढना शुरू करते है। एक बार तरीका आजमा कर देखने में क्या हर्ज़ है.मेरे भाई की बात मानकर ही सही ,बस एक बार यह आदत डालो तो सही।
विश्वनाथ भाटी,तारानगर 9413888209
बात तब की है जब मैंने पुस्तकालय में नया नया खाता खुलवाया ही था। रोज-रोज नयी -नयी किताबे पढना,उन पर चर्चा करना और बापूजी से जानकारी लेना नित्यकर्म ही बन गया था। जल्दी से जल्दी किताब पूरी करने की ललक रहती थी। इसी क्रम में उस दिन मैं किताब लेकर आया और पढने बैठ गया। बड़े भाई साहब स्व० श्री धनराज भाटी की नज़र मुझ पर पड़ी। मुझे इशारे से अपने पास बुलाया।
"क्या कर रहे हो?"
"किताब पढ़ रहा हूँ।"
"इतने पन्ने पलट क्यों दिए?"
"ये सब बकवास है.किताब की कहानी तो यहाँ से ही शुरू हो रही है। "मैंने स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया।
"जानते हो यह किताब लेखक ने क्यों लिखी?"
"नहीं तो.पर इस से मुझे क्या?"मैंने बात साफ की।
"एक बात ध्यान से सुनो। प्रण करो की आज के बाद कभी किताब पढने की शुरुआत इस तरह नहीं करोगे। किताब की भूमिका पढ़े बिना किताब पढनी शुरू करना उस किताब,उसके लेखक और माँ सरस्वती का अपमान है। सुनो ,यदि तुम्हारे पास किताब पढने का पूरा समय नहीं हो तो भी उसकी भूमिका तो जरुर पढ़ लेना। "
मैं कुछ समझा,कुछ नहीं समझा मगर आज उस सीख का महत्त्व बखूबी समझ आ रहा है। आज भी कई लोग किताब को मेरे पुराने तरीके से ही पढना शुरू करते है। एक बार तरीका आजमा कर देखने में क्या हर्ज़ है.मेरे भाई की बात मानकर ही सही ,बस एक बार यह आदत डालो तो सही।
विश्वनाथ भाटी,तारानगर 9413888209
Sunday, March 28, 2010
कहाँ गये वो दिन?
बचपन की यादें
बचपन की दुनिया भी कितनी रंग बिरंगी होती है । तरह तरह के विचार मन में उमड़ घुमड़ करते रहते थे । हर एक नई वस्तु आकर्षण का बिंदु हुआ करती थी। मेरे बचपन के समय मनोरंजन के आज के इतने साधन नहीं हुआ करते थे। हम माचिश की डिब्बी के लेबेल,टूटी हुई चूड़ियाँ,खजूर की गुठलियाँ ,इमली के बीज ,कांच की गोलियां आदि को अपनी खेल की सामग्री बनाकर बहुत खुश थे। रूठना ,मनाना,झगड़ना,बतियाना आदि हमारी दिनचर्या का भाग था। यदि किसी बात पर झगड़ भी लिए तो लड़ाई आजकल की तरह परिवारों में नहीं जाती थी।
आज बचपन सिमटकर बेडरूम तक आ गया है। गली में खेलना असभ्यता बन गया है। कांच की गोलियों का स्थान वीडियो गेम के रिमोट ने ले लिया। बच्चों के नाम पर बड़ों का अहंकार टकरा रहा है। गाँव की चौपाल सिमट कर घर की बंद दरवाजे वाली बैठक बन गयी। घर का बुजुर्ग घर की चार दिवारी में घुट घुट कर मर रहा है। बेटों को बाप के पास बैठने की फुर्सत नहीं। पोता अपने वजन से भी भारी बस्ता लिए भाग कर स्कुल बस पकड़ रहा है। बच्चा जल्दी ही बड़ा हो गया है। वह दादा की झोली में बैठकर कहानी सुनने का हक़ खो चुका है। उसकी मम्मी जल्दी से उसे होमवर्क करवाकर सुला देना चाहती है। दादा के पास रहने पर बच्चे में बिगड़ने का दर मम्मी को हरदम सताता रहता है।
कहाँ गये वो दिन?
बचपन की दुनिया भी कितनी रंग बिरंगी होती है । तरह तरह के विचार मन में उमड़ घुमड़ करते रहते थे । हर एक नई वस्तु आकर्षण का बिंदु हुआ करती थी। मेरे बचपन के समय मनोरंजन के आज के इतने साधन नहीं हुआ करते थे। हम माचिश की डिब्बी के लेबेल,टूटी हुई चूड़ियाँ,खजूर की गुठलियाँ ,इमली के बीज ,कांच की गोलियां आदि को अपनी खेल की सामग्री बनाकर बहुत खुश थे। रूठना ,मनाना,झगड़ना,बतियाना आदि हमारी दिनचर्या का भाग था। यदि किसी बात पर झगड़ भी लिए तो लड़ाई आजकल की तरह परिवारों में नहीं जाती थी।
आज बचपन सिमटकर बेडरूम तक आ गया है। गली में खेलना असभ्यता बन गया है। कांच की गोलियों का स्थान वीडियो गेम के रिमोट ने ले लिया। बच्चों के नाम पर बड़ों का अहंकार टकरा रहा है। गाँव की चौपाल सिमट कर घर की बंद दरवाजे वाली बैठक बन गयी। घर का बुजुर्ग घर की चार दिवारी में घुट घुट कर मर रहा है। बेटों को बाप के पास बैठने की फुर्सत नहीं। पोता अपने वजन से भी भारी बस्ता लिए भाग कर स्कुल बस पकड़ रहा है। बच्चा जल्दी ही बड़ा हो गया है। वह दादा की झोली में बैठकर कहानी सुनने का हक़ खो चुका है। उसकी मम्मी जल्दी से उसे होमवर्क करवाकर सुला देना चाहती है। दादा के पास रहने पर बच्चे में बिगड़ने का दर मम्मी को हरदम सताता रहता है।
कहाँ गये वो दिन?
Friday, March 26, 2010
खुसर फुसर
परीक्षा के दिनों में एक अजीब बात सामने आती है। परीक्षार्थी चाहता है कि किसी प्रकार सफलता उसकी झोली में आ जाये। इसके लिए वह हर दांव चलाना चाहता है। परीक्षा हॉल में खुसर फुसर करके ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहता है। जब कक्षा में गुरूजी ने बताया;समझ में नहीं आया.ब्लेकबोर्ड पर लिख कर समझाया,नहीं समझ में आया.लिख लिख कर बताया, नहीं समझ में आया। चार्ट,मोडल से बताया,नहीं समझ में आया। टूशन पढ़कर आया, फिर भी नहीं समझ में आया.परीक्षाहॉल में नज़र चुकाकर थोड़ीसी खुसर फुसर कर ली । सबसे आगे वाले की खुसर फुसर सबसे पीछेवाले की समझ में आ गयी। वाह री परीक्षा, तुम भी कमाल करती हो।
विश्वनाथ भाटी तारानगर
9413888209













विश्वनाथ भाटी तारानगर
9413888209














Sunday, March 21, 2010
दुनिया तेज गति से चल रही है। हमें दुनिया के साथ चलना है तो अपने क़दमों की गति बढानी पड़ेगी। दुनिया के साथ बढ़ते हुए आगे चलना कितना अच्छा लगता है। कोई आगे निकल जाता है तो अपने कदम तेज कर दो । दुनिया रोनेवालों का साथ नहीं देती। यदि हम हंसेंगें तो दुनिया हमारे साथ हँसेंगी ;पर यदि रोयेंगे तो हमें अकेले रोना पड़ेगा।
विश्वनाथ भाटी तारानगर
विश्वनाथ भाटी तारानगर
Saturday, March 20, 2010
पहली पाती
पहली पाती भाई दुलाराम के नाम
ब्लॉग की दुनिया में लाने के लिए छोटे भाई दुलाराम सहारण को दिल से धन्यवाद् । विश्वनाथ भाटी,तारानगर [चुरू]
ब्लॉग की दुनिया में लाने के लिए छोटे भाई दुलाराम सहारण को दिल से धन्यवाद् । विश्वनाथ भाटी,तारानगर [चुरू]
Subscribe to:
Comments (Atom)
