Friday, August 20, 2010

तब नैना कछु और थे अब नैना कछु और

                        समाज में रहते हुए अनेक बार अपनी जरूरत के लिए दूसरों क‍ी मदद लेनी पडती है। रही बात रुपयों पैसों के लेनदेन की सो अधिक पैसेवाला हो या कम पैसोंवाला सबको ही जरुरत पडती रहती है।इस विषय में जो विचारणीय बात है वह यह कि तब नैना कछु और थे अब नैना कछु और अर्थात्‍ा जरुरत पडने और जरुरत पूरी होने के बाद नैन पलट जाते हैं। मेरे भाई साहब ने बताया कि व्‍यवहार कमाना पडता है। लेने के समय किया गया वादा देने के वक्‍त भी याद रहना चाहिए। वादा करते समय अपनी क्षमता का आकलन कर लेना अच्‍छा रहता है। वादे पर खरा उतर कर अपना व्‍यवहार बना रह जाता है। यदि मजबूरी हो भी जाए तो उस व्‍यक्ति को छोडकर बाकी पूरी दुनिया आपके सामने है। इससे उस व्‍यक्ति के सामने हमारा वचन खडा रह जाता है। एक बार आजमा कर तो देख लीजिए।    विश्‍वनाथ भाटी तारानगर

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