Saturday, October 9, 2010

सिंचोगे शंकर,बगीचा खिलेगा.

वर्ष १९९०-९१ .मैं सरदारशहर  में बी.एड .कर रहा था.आर्थिक तंगी के दिन थे .जेब में सिर्फ ७.५० रूपये थे .अर्जुन कलब की ढलान पर मेरी बिना ब्रेक की साईकिल आगे बढ़ रही थी.साईकिल की घंटी को सुना अनसुना करके चाय की दुकान पर काम करनेवाला एक लड़का चला जा रहा था.बचाते-बचाते आगे का पहिया उसके हाथ के छींके से जा टकराया.चटक,चटक,चटक...तीन गिलाश टूट गये.मैंने बिगड़ते हुए कहा सुनाई नहीं देता क्या?लड़का बोला ,"साहब,साढ़े चार रूपये दे दीजिये ,तीन गिलाश टूट गये हैं."
"क्या कहा!साढ़े चार दे दूँ?हराम में आते हैं क्या?गलती तुम्हारी है.एक तरफ चलो और मुड़कर भी देखो,समझे?"
"साहबजी ,मेरी गलती रही होगी मगर मेरा मालिक मुझे बहुत मारेगा.मुझे नौकरी से भी निकल देगा."उसके चेहरे पर करुणा झलक रही थी.मैंने जेब से साढ़े चार रूपये निकल कर उसकी हथेली पर राख दिए.मैं कभी अफशोस तो कभी फकीरी हंसी हंस रहा था.
पहला घंटा बजते-बजते चपरासी ने कक्षा में आकर मेरा नाम पुकारा.डाकिया मेरे नाम ३० रूपये का मनी आर्डर  लिए खड़ा था.शिविरा में छपी रचना का मानदेय था.मैंने प्रभु का धन्यवाद् किया.मेरे मुख से निकला..
                                        जो देगा,दिया है,दिया सो मिलेगा.   
                                             सिंचोगे शंकर,बगीचा खिलेगा.

No comments: